[0–3s | Hook – कैमरे की ओर देखो]

[0–3s | Hook – कैमरे की ओर देखो]

[0–3s | Hook – कैमरे की ओर देखो] “सुनो साहब… सच सुनने का हौसला है क्या?” [4–12s | जंगल वाला दौर] “जब इंसान जानवर था ना… तब कानून नहीं, बस ताक़त का राज था! जिसकी मुठ्ठी मज़बूत— वही सही, वही ख़ास था!” [13–22s | नियम-क़ानून बने] “फिर हमने किताबें लिखीं… नाम दिया—नियम और क़ानून! कहा—अब ताक़त नहीं चलेगी, अब चलेगा इंसाफ़ का जुनून!” [23–34s | आज की सच्चाई] “मगर आज क्या बदला है यहाँ? कल नाख़ून से मारते थे, आज दस्तख़त से मारते हैं यहाँ! काग़ज़ों में इंसाफ़ चमकता, सड़कों पर सच दबा हुआ है!” [35–45s | Punchline + Call] “जंगल में खुले जानवर थे हम, शहर में नक़ाब लगाए फिरते हैं जनाब! अगर इंसान बनना है— ताक़त नहीं, इंसाफ़ चुनो!”

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